Hindi Kahaniya :  हिंदी कहानियां – सीख



नन्ही गिलहरी की कहानी | हिंदी  कहानी  | Moral Stories in Hindi | Hindi Kahaniya

हमें घबराकर या निराश होकर किसी कार्य को छोड़ना नहीं चाहिए। यदि हम निरंतर प्रयास करें तो सफलता अवश्य मिलेगी। आइए, महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित एक घटना पढ़ें।


महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वे राजकुमार थे किंतु उनका मन नहीं लग रहा था। एक दिन वे ज्ञान प्राप्त करने के लिए घर से निकल पड़े। घने जंगलों में उन्होंने खूब तप किया लेकिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। काफ़ी दिनों तक शरीर को कष्ट दिया और भूखे-प्यासे भी रहे। एक समय ऐसा आया जब वे हताश हो गए। उन्हें अपने आप पर भी विश्वास नहीं हो पा रहा था कि वे सफल हो पाएँगे या नहीं।


उसी क्षण महात्मा बुद्ध को प्यास लगी। वे उठकर एक झील के समीप पहुँचे। वहाँ उनकी दृष्टि एक गिलहरी पर पड़ी। वह गिलहरी बार-बार झील में डुबकी लगाती और बाहर आकर रेत में लेटती। पुनः झील में डुबकी लगाने दौड़ पड़ती। यह देखकर महात्मा बुद्ध को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने गिलहरी के पास जाकर उससे पूछा, “नन्ही गिलहरी! तुम ये क्या कर रही हो?"

गिलहरी बोली “इस झील ने मेरे दो बच्चों को खा लिया है। इसलिए, में इसे सुखा रही हूँ।

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महात्मा बुद्ध को यह सनकर बहत आश्चर्य हुआ। उन्होंने उससे फिर  पूछा, "तुम जो कर रही हो क्या यह संभव है?”

यह मैं नहीं जानती परन्तु जब तक यह सूख नहीं जाएगी, में प्रयास करती रहूँगी।गिलहरी ने जवाब दिया।

गिलहरी की बातें सुनकर महात्मा बुद्ध को बहुत आश्चर्य हुआ। वे बोल पड़े, “इस जन्म में तो यह संभव नहीं लगता।

उनकी बात सुनकर गिलहरी ने कहा, “इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा पानी

निकालकर शायद मैं इस झील को सुखा दूंगी। ऐसा मेरा विश्वास है।



महात्मा बुद्ध को गिलहरी की बात समझ आ गई। वे समझ गए कि हमें अपनी तपस्या में लगे रहना चाहिए। हमें अपने आप पर भरोसा रखना चाहिए। तभी हम अवश्य सफल होंगे।

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