उड़ गई मैना | Moral Stories in Hindi | Hindi Kahaniya


उड़ गई मैना | Moral Stories in Hindi | Hindi Kahaniya


एक नवाब साहब थे । शानो-शौकत से रहते थे । नवाब साहब को वरह-तरह के पक्षी पालने का शौक था । उन पक्षियों में एक मैना भी थी । वह नवाब साहब से खूब बातें करती । मैना की बातें उन्हें बहुत भाती थीं। उसके लिए सोने का पिंजरा था । अच्छी से अच्छी चीज उसे खाने को मिलती थी । पर उसके पाँव सोने की जंजीर से बंधे रहते थे । 

नवाब साहब मैना का पूरा ख्याल रखते थे। लेकिन मैना का दिल कभी-कभी उदास हो जाता था । आसमान में उड़ते पक्षियों को देखकर उसका दिल भर आता । उसका भी मन खुले आसमान में उड़ने के लिए बेचैन हो जाता । वह पिंजरे में फड़फड़ाने लगती । लेकिन पिंजरे से बाहर न निकल पाती। 

एक रोज मैना ने अपने दिल की बात नवाब साहब को बताई । नवाब साहब ने उसे समझाया-"आजाद पक्षी कभी गरम और कभी ठण्डी हवा में उड़ते हैं । पेड़ की शाखाओं पर रात गुजारते हैं । कभीकभी भूखे-प्यासे तक रह जाते हैं । इतना आराम उनको कहाँ नसीब होता है । तुम बहुत आराम से यहाँ रह रही हो ।" 

फिर नवाब साहब ने मैना के लिए बाग से ताजे फल मंगवाए । उन्होंने मैना को खूब समझाया । मैना भी उनकी बातों में आ गई । वह अपने भाग्य पर इतराने लगी और पहले की ही तरह चहकने लगी। 

एक दिन नवाब साहब को शिकार के लिए जाना था । चलते वक्त उन्होंने मैना को भी साथ ले लिया । वह खूब घूमे-टहले । फिर एक घने जंगल में उन्होंने डेरा डाल दिया । सामने छोटा-सा मैदान था । मैदान चारों तरफ से पेड़ों से घिरा था । पेड़ों पर पक्षी बैठे थे। 

मैना हरा-भरा जंगल देखकर बहुत खुश हुई । वह पक्षियों की हालत देख, हंसने लगी । नवाब शिकार के लिए निकल गए थे । मैना को इतराते देखकर पक्षियों ने उसके पिंजरे को घेर लिया । एक पक्षी ने मैना से पूछा-"तुम्हें इस तरह की जिंदगी गुजारने में दुःख नहीं होता?" 

मैना ने जवाब दिया-"मैं तुम लोगों से ज्यादा सुखी हूँ। मैं अच्छा खाना खाती हैं। सोने के पिंजरे में रहती हूँ। नवाब साहब मेरा पूरा ख्याल रखते हैं । मुझे तो पिंजरे में आराम ही आराम है । पर तुम सब दर-दर भटकते रहते हो।" 

दूसरा पक्षी बोला-"लेकिन यह सब तो नवाब साहब का है।" 

मैना ने कहा-"तो क्या हुआ ? वह मेरा बहुत ख्याल रखते हैं।" 

तीसरा पक्षी बोला-"तुम्हारी इस जिंदगी से मोत अच्छी है । मैना होकर भी तुम खुले आसमान में नहीं उड़ सकतीं । तुम एक-एक दाने के लिए नवाब साहब की मोहताज हो । हमें देखो, हम अपनी मर्जी के मालिक हैं । अपनी मेहनत से अपना भोजन जुटाते हैं । आजादी से खुली हवा में उड़ते हैं । लेकिन तुम पिंजरे में दिन-रात कैद रहती हो।" 

यह सुन, मैना का माथा ठनका । उसे पक्षियों की बातों में सचाई नजर आई । उसने कहा-"लेकिन मैं नवाब साहब के.पिंजरे से कैसे छुटकारा पा सकती हूँ ?" 

सारे पक्षी एक साथ मिलकर बोले-"हम तुम्हारी मदद करेंगे।" 

मैना ने कहा-"मुझे किसी तरह इस कैद से आजाद करा दो । मैं तुम सबका उपकार कभी नहीं भूलूंगी।" 

तुरंत पक्षियों ने मिलकर पिंजरे की सलाखें काट दी । 

एक पक्षी ने मैना के पांव की जंजीर खींचकर तोड़ दीं । मैना पिंजरे से आजाद होते ही खुली हवा में उड़ने लगी। कुछ देर बाद वह हरे-भरे मेदान में उतरी । फुदक-फुदककर फल खाने लगी। 

शाम को नवाब साहब आए । मैना को पिंजरे में न देखकर उदास हो गए । पास में पड़े टूटे पिंजरे को उठाकर देखने लगे । मैना भी पेड़ पर खामोश बैठी थी । वह नवाब साहब को देख रही थी। 

अचानक मैना ने नवाब साहब को जोर से पुकारा । बोली"नवाब साहब ! ऐसा दाना बेकार है जो दूसरों को आलसी और सुस्त बना दे । सबको अपनी खुराक के लिए खुद मेहनत करनी चाहिए।" यह सुन, नवाब साहब दंग रह गए । पर वह क्या करते ? मैना भी पक्षियों के झुंड में जाकर घुल-मिल गई थी।

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