मुंशी जी


कंजूस मुंशी जी की कहानी  | Moral Stories in Hindi | Hindi Kahaniya


मुंशी गिरधारीलाल किस जाति के थे, यह तो पता नहीं, पर मुंशीगीरी उनका पुश्तैनी धंधा था । उनके पिता जमींदार के यहाँ मुंशी थे । 

मुंशी गिरधारीलाल को मुंशीगीरी के अलावा एक और विशेषता धरोहर में मिली थी । वह थी कंजूसी । 

मुंशी गिरिधारी अपनी इन दोनों विरासतों को बखूबी ढोए जा रहे थे । कान पर कलम चढ़ाकर सुबह से शाम तक मुंशी का काम संभालते । आना-पैसा का हिसाब रखते । 

घर पर छोटे बच्चे आशा लगाए रहते कि किसी दिन तो पिता जी राह की दुकान से जलेबी का एक दोना लायेंगे, पर उनकी आशा पर सदा पानी फिरता रहता । मुंशी गिरिधारीलाल इन फालतू चीजों में पैसा खर्च करने वाले नहीं थे । किसी तरह खाने, कपड़े का जुगाड़ कर दिया, इससे अधिक बीवी-बच्चों पर वह खर्च करने वाले नहीं थे। 

. मुंशी गिरिधारीलाल को एक दिन जरूरी कार्यवश गांव से बाहर जाना पड़ा । दिन भर की यात्रा थी । अतः राह में खाने के लिए चार मठी चिउड़े एक पोटली में बांध कांख के नीचे दबा लिए । उन्हें भय था, राह में कोई भिखारी मिल गया और उसकी नजर उस पोटली पर पड़ गई, तो वह भारी असमंजस में पड़ेंगे । पोटली तो उसे वह देंगे नहीं, पर भिखमंगे की नजर लगी पोटली कां चिउड़ा भी उनके पेट के अंदर नहीं उतर पाएगा। 

_ पर गलती होनी थी, सो हो गई । गर्मी के दिन थे । भूख ने जोर मारा । रास्ते में पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर उन्होंने पेट पूजा के लिए कांख के नीचे से पोटली खींची । उसे खोलकर भूखी आंखों से उन सफेद-सफेद चिउड़ों को निहारा । मुंशी जी का दुर्भाग्य । उसी समय अकस्मात आंधी का हल्का झोंका आया और आधे चिउड़ों को उड़ा ले गया । उसी के साथ उड़ गई मुंशी जी की भूख भी । आजीवन किसी को एक दाना भी नहीं देने वाले के पाव-आध पाव चिउड़े हवा के हवाले हो गए थे। मुंशी जी देर तक सिर पर हाथ रखे बैठे रहे । अब कहाँ का खाना और कहाँ का पीना ! उन्हें चिंता यह लगी कि इन उड़े हुए चिउड़ों का कैसे सदुपयोग हो ! चिउड़े तो उड़ ही गए थे ! उनका अब खाक उपयोग होता । पर हार ही मान जाएँ, तो मुंशी गिरिधारीलाल की बुद्धि क्या ? 

। आखिर उन्हें एक युक्ति सूझ गई । उन्होंने आज तक दान-पुण्य तो कुछ किया ही नहीं था । भिखारियों को भीख नहीं दी, चंदेवाले छोकरों को दरवाजे से दुत्कारा, यह सब तो अलग बात थी । भूलकर किसी मंदिर-मठ में भी नहीं गए । 

उड़े चिउड़ों का उपयोग उन्हें अब सूझा । वह झट से अपना बनाया मंत्र बोल उठे-"उधिवाइला चिउड़ा देवताष्ठन्तु ।" अर्थात उधियाए चिउड़े देवताओं को मिलें । इसके बाद मुंशी जी ने संतोष की सांस ली कि चलो, जीवन में एक पुण्य कार्य तो किया । उसी संतोष के बल पर बचे चिउड़ों से ही उन्होंने पेट पूजा कर ली। 

कई वर्ष तक मुंशीगीरी करने के बाद, गिरिधारीलाल की सत्तर वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई । मरते ही यमदूत आ गए । उन्हें यमराज और चित्रगुप्त के सामने ला खड़ा किया। 

"मुझे यहाँ क्यों लाया गया ?" -मुंशी गिरिधारी ने यमराज से पूछा-"मैं तो स्वर्ग का अधिकारी हूँ?".

यमराज ने चित्रगुप्त की ओर देखा और पूछा-"कोई भूल हुई क्या ?" 

"नहीं महाराज, कोई भूल नहीं हुई ।"-चित्रगुप्त ने अपने बहीखाते को उलटते हुए कहा-"यह व्यक्ति है ही नर्क के योग्य । इसने जीवन में कोई पुण्य कार्य नहीं किया । भिखमंगों, लाचारों की इसने एक पैसे की. भी सहायता नहीं की । उलटे जमींदार के मुंशी के रूप में रियाया को लूटता रहा । जमींदार की तिजोरी से पैसा उड़ाकर अपना घर भरता रहा ।" 

"यह झूठ है ।"-मुंशी ने विरोध किया-"माना मैंने ये कार्य भी किए हैं, पर मैंने पुण्य भी किया है । पहले मुझे उसका फल मिलना चाहिए, फिर चाहे मुझे रौरव नरक में ही धकेल दो।" 

यमराज ने फिर चित्रगुप्त को इशारा किया । उन्होंने अपने पोथीपत्रों को फिर देखा । बोले-"नहीं धर्मराज, इस मुंशी ने कोई पुण्य कार्य नहीं किया ।" 

"जो धरती की हालत, वही यहाँ की ।" मुंशी गिरिधारी इस बार उत्तेजित होकर बोले-"मैं समझता था, धांधली धरती पर ही है, पर यहाँ भी वह कुछ कम नहीं । मेरे साथ सरासर अन्याय हो रहा है । जब 

धर्मराज की अदालत में ही न्याय नहीं मिलेगा तो और कहाँ इसकी अपेक्षा की जा सकती है ?" 

चित्रगुप्त, मुंशी के इस आक्रोश पर घबराए । उन्होंने मुंशी के खाते को आरम्भ से लेकर अंत तक अक्षर-अक्षर पढ़ा । आखिर उनकी दृष्टि कोने में अंकित इस बात पर पड़ी-'इन्होंने एक बार आंधी में उड़ गए चिउड़े के दानों को देवताओं को अर्पित किया है।' 

"वही तो, वही तो ...." -मुंशी की बांछे खिली-"कह रहा था न मैं कि मैंने पुण्य कार्य किया है। अब शीघ्र उसका फल मिले।" 

"पर उसका फल पहले कैसे मिलेगा ?"-चित्रगुप्त ने धर्मराज की ओर देखते हुए कहा-"इन्होंने इतने पाप किए हैं, उनके कारण नरक की सजा भोगने के पश्चात् ही लाचारी में किये गये इस छोटे-से पुण्य कार्य के फल पर विचार होगा।" 

मुंशी ने अपने अनुभव का सहारा लिया-"अच्छा पहले और बुरा बाद में । अच्छाई पर बुराई यहाँ भी हावी होने लगी है, तो धरती का हो गया बंटाधार ? मुझे पहले पुण्य कार्य का फल चाहिए।". 

- धर्मराज ने चित्रगुप्त की ओर देखा और कहा-"मुंशी की बात मान लें, तो भी समस्या का समाधान नहीं होता है । तीनों लोकों में ऐसा विचित्र पुण्य कार्य तो किसी ने आज तक किया ही नहीं, अतः ऐसे पुण्य का क्या फल दिया जाए ? इसका तो कहीं कोई विधान ही नहीं है ।" 

'"ठीक कहा महाराज ने ।"-चित्रगुप्त ने भी आंखों में विवशता भर, यमराज की ओर देखा ।... 

"मैं इसका फल बताऊँ ?"-मुंशी , बोले । 

"बोलिए ।"-धर्मराज बोले । 

मैं एक बार स्वर्ग को देखना चाहता हूँ फिर मुझे नरक में ले जाना 

बात यमराज और चित्रगुप्त दोनों को जंच गई । दो यमदूत मुंशी के साथ कर दिये गए । आदेश हुआ कि जैसे ही स्वर्ग की झलक दिख जाए, मुंशी को वापस ले आएँ । 

यमदूतों की गति तेज थी । मुंशी को लेकर स्वर्ग की ओर पड़े। थोड़ी ही देर में स्वर्ग आँखों में चकाचौंध पैदा करने लगा यमदूतों ने मुंशी को कंधे से उतारा और कहा-"ठीक से देख लो । शीघ लौटना भी है।" 

"क्या देख लूँ ? किधर देख लूँ ? यमदूत कुछ और आगे बढ़े । अब स्वर्ग की दीवारों की सोने की ईंट-ईंट तक दिखाई पड़ने लगी थी। 

"अब देखा ?"-यमदूतों ने पूछा । 

मुंशी जी बोले मेरी मृत्यु बुढ़ापे में हुई है । आँखों से कुछ ठीक से दिखाई नहीं देता । तुम्हें दिखाना हो तो दिखाओ, वर्ना लौटा ले चलो मुझे वहाँ यमराज के यहाँ । मुझे तुम्हारी शिकायत करनी पड़ेगी ।" 

कुछ तो क्रोध और कुछ घबराहट में यमदूतों ने मुंशी को स्वर्ग की चौखट पर ही खड़ा कर दिया । बोले-"अब देखा ? चलो अब ।" 

मुंशी स्वर्ग की चौखट पर चारों खाने चित पड़ गए । आधा शरीर भीतर, आधा बाहर, और जोर-जोर से चिल्लाने लगे-"बचाओ, बचाओ " 

- शोर सुनकर इंद्र महाराज स्वयं दौड़े हुए आए और मुंशी को इस हालत में पड़े देखकर पूछा-"क्या बात है ?" 

"अब क्या बताऊँ ?"-मुंशी ने इंद्र देवता के चरणों को दोनों हाथों से पकड़कर कहा-"मैं आपकी शरण हूँ। ये मुझे खींचकर ले जा रहे हैं । मुझे बचाइए।" 

"नहीं महाराज, यह झूठ बोल रहा है ।"-यमदूतों ने प्रतिवाद करना चाहा । 

देवराज मुसकराए और बोले-"मैं सब समझ गया । पर जब यह मेरी शरण में आ गया, तो यहीं रहने दो । और हाँ, मेरी ओर से 

धर्मराज को संदेश दे देना कि आगे से किसी मुंशी के झांसे में न । आएँ।"


Story of the Miser Munshi Moral Stories 


I do not know what caste Munshi Girdhari Lal was, but Munshegiri was his ancestral business. His father was a scribe at the zamindar.


Munshi Girdhari Lal got another specialty in heritage apart from Munsigiri. She was a skimp.


Munshi Giridhari was carrying his two legacies well. He used to handle the act of scribe from morning to evening with a pen on his ear. Keep an account of money and money.


Little children at home kept hoping that someday the father would bring one of Jalebi from the road store, but his hope always kept running. Munshi Giridhari Lal was not going to spend money in these useless things. Somehow he ate food, clothes, he was not going to spend more on his wife and children.


Munshi Giridhari Lal had to go out of the village for the necessary work one day. It was a day trip. So in order to eat on the way, four Mathi chiudas in a bundle were pressed under the dam armpits. He was afraid, he found a beggar on the way and his eyes fell on that bundle, then he would be in a lot of confusion. He would not give it to Potli, but the eye of a beggar would not be able to get inside his stomach.


But there was a mistake, it happened. They were summer days . Hunger hit hard. On the way, sitting under the Peepal tree, he pulled the bundle from under the armpit for belly worship. Opening it, starved those white-white chiudes with hungry eyes. Munshi's misfortune. At the same time, a sudden flash of thunderstorm came and blew away half the chiruses. Munshi's hunger also flew with that. Those who did not even give a grain to anyone for a lifetime had been given a thunderbolt. Munshi ji kept sitting with his hands on his head for a long time. Now where to eat and where to drink! They worried about how to use these flying chiudas well! Chiude had flown away! They would now be used. But if we give up, what is the wisdom of Munshi Giridhari Lal?


At last, he got an idea. Till today, he had not done any charity or charity. Did not give alms to beggars, chanted men from door to door, all this was a different matter. Did not forget to go to any temple or monastery.


Use of flying chiudas now senses them. He quickly uttered his mantra - "Udhivaila Chiuda Devastushtu". That is, meet the deities of Chuide. After this Munshi ji took a breath of satisfaction that let's do a virtuous work in life. With the help of the same satisfaction, he worshiped the stomach from the Chiu.


Giridhari Lal died at the age of seventy, after doing many years of scribing. As soon as he died, the Yamdoots came. Launched him in front of Yamraj and Chitragupta.


"Why was I brought here?" - Munshi Giridhari asked Yamraj- "I am a possessor of heaven?".


Yamraj looked at Chitragupta and asked- "Have you made any mistake?"


"No Maharaj, there is no mistake." - Chitragupta reversed his book, saying - "This person is worthy of hell. He did not do any virtuous work in life. It helped a lot of beggars, helpless people. Not even help." Of the opposite. As the zamindar's scribe continued to rob Riya. He kept filling his house by blowing money from the zamindar's vault. "


"This is a lie." - Munshi protested - "I have done these things too, but I have also done virtue. First I should get the fruit of it, even if I will be pushed into hell."


Yamraj then gestured to Chitragupta. He saw his pothipatras again. Said- "No Dharmaraja, this scribe did not do any pious work."


"The condition of the earth is here." Munshi Giridhari said this time excitedly - "I used to think, rigging is on the earth, but here ... that is nothing less. Sheer injustice is happening to me. When


If justice will not be found in Dharmaraj's court itself, where else can it be expected? "


Chitragupta panics at Munshi's indignation. He read the account of the scribe from beginning to end. After all, his eyes were engraved in the corner - 'He has once offered the seeds of chiudas that have flown in the storm.'


"He is the same, he is ...." - Munshi's mustache blossomed - "I was not saying that I have done virtuous work. Now it will be rewarded soon."


"But how will he get his fruit first?" - Chitragupta looked at Dharmaraja and said- "They have committed so many sins, because of this they will consider the fruit of this small virtuous work done in helplessness only after suffering the punishment of hell.". "


The scribe resorted to his experience - "Good before and bad later. Evil over good has begun to dominate here too, so the earth has become divided? I want the fruits of virtuous work first.".


Dharmaraja looked at Chitragupta and said - "Even if you listen to the act of Munshi, the problem is not solved. No one has done such a bizarre virtuous work in the three worlds, so what should be the result of such virtue?" Is there any legislation for this? "


"Maharaja rightly said." - Chitragupta too looked at Yamraj with compulsion in his eyes ...


"May I tell you its fruit?" - Munshi said.


"Speak." - Dharmaraja said.


I want to see heaven once and then take me to hell.


The matter went to both Yamraj and Chitragupta. Two Yamdoots were done with the scribe. It was ordered that as soon as the glimpse of heaven is visible, bring back the scribe.



The speed of the Yamdoots was fast. With the scribe, he went towards heaven. Heaven eyes in a while


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