तीन दरवाजे की कहानी | Moral Stories in Hindi | Hindi Kahaniya

तीन दरवाजे की कहानी | Moral Stories in Hindi | Hindi Kahaniya


कलिंग देश के राजा यशोधरा की एक बेटी थी । उसका नाम सुचिमा था । वह बड़ी सुंदर, सुशील और वीर थी । उसके इन गुणों की चर्चा घर-घर होती थी । सुचिमा बड़ी हो गई, तो राजा को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। 

यूं तो हजारों युवक सुचिमा से विवाह करने के इच्छुक थे, परन्तु उनमें से राजा को कोई भी पसंद नहीं आता था । यदि कोई लड़को यशोधन को पसंद आ जाता, तो वह सुचिमा को पसंद नहीं आता था । इस प्रकार सुचिमा का विवाह राजा के लिए चिंता का विषय बन गया । वह दिन-रात इसी उलझन में खोए रहते । एक दिन यशोधन के गुरु महल में पधारे । राजा ने उन्हें अपनी समस्या बताई। 

"बस, इतनी-सी बात के लिए दुखी हो ?" -राजा की बात सुनकर गुरुदेव हँस पड़े-"इसका इलाज बहुत आसान है ! सुचिमा के विवाह के लिए स्वयंवर रचाओ । स्वयंवर द्वारा जो वर सुचिमा को मिलेगा, वह उसके बिलकुल योग्य होगा ।" 

"स्वयंवर के लिए क्या शर्त रखू गुरुदेव!" - राजा ने पूछा । 

गुरुदेव बोले जंगल में जो रास्ता है वह एक गुफा पर ख़त्म होता है । उस गुफा में अनमोल खजाना है । खजाने तक पहुँचने के लिए तीन दरवाजों से गुजरना पड़ता है । जो युवक उन तीन दरवाजों से गुजरकर वह अनमोल खजाना लाएगा, उसका विवाह राजकुमारी सुचिमा के साथ कर दिया जाएगा ।" 

"यह तो बहुत अच्छी बात है ।" -राजा की आँखें खुशी से चमकने लगीं । उसने तुरंत घोषणा करने का आदेश दे दिया। 

घोषणा सुनते ही राजकुमारी सुचिमा से विवाह करने के इच्छुक नवयुवक खुशी से झूम उठे । वे उस अनमोल खजाने की खोज में अलग-अलग चल पड़े । परन्तु खजाने तक पहुँचने का रास्ता इतना आसान नहीं था । वह बड़ा ही भयानक जंगल था । जंगली जानवरों की। भरमार थी । कदम-कदम पर विषैले कीड़े-मकोड़े रेंगते थे । जानवरो और कीड़ों से बचते हुए रास्ता ढूँढ़ना बहुत कठिन था ।

जो युवक उस खजाने की खोज में निकले थे, वे जंगल में पहुंचते ही जंगली पशुओं से डरकर या घायल होकर लौट आए । कुछ आगे बढ़े भी, तो जा न सके, क्योंकि जहाँ वह जंगल समाप्त होता था, वहाँ तेजी से बहने वाली एक नदी थी । उसमें बड़े-बड़े घड़ियाल थे। 

उस नदी के पानी का बहाव बहुत तेज था, इसलिए वहाँ नाव नहीं। चल सकती थी । उस नदी को तैरकर पार करने के सिवा कोई चारा नहीं। था । परन्तु नदी में उतरना अपनी मौत को निमंत्रण देने के समान था।। घड़ियाल नदी में उतरने वाले पर टूट पड़ते थे । और उसे चट कर जाते थे । यह देख, सभी हिम्मत हार गए। 

कलिंग में ही समीर नाम का एक बहादुर नवयुवक भी रहता था। उसने घोषणा सुनी, तो उसके मन में भी राजकुमारी को पाने की इच्छा जागी । वह उस अनमोल खजाने को लाने के लिए निकल पड़ा। 

जंगल से गुजरते हुए उसे भी उन्हीं मुसीबतों का सामना करना पड़ा । रास्ते में उसे एक जगह एक साँप ने डस लिया । बड़ी मुश्किल से उसने विष उतारा । आगे एक शेर ने उस पर आक्रमण करके बुरी तरह घायल कर दिया । फिर भी मुसीबतों को झेलता, वह किसी तरह नदी के किनारे पहुँच गया । 

नदी के किनारे पहुँचते ही उसे नदी में कई घड़ियाल तैरते नजर आए । परन्तु उसने हिम्मत दिखाई । अपनी तलवार मजबूती से थाम कर दिया । वह नदी में कूद गया । नदी में कूदते ही उस पर कई घड़ियालों ने हमला कर दिया 

समीर अपनी तलवार से उन्हें मारने-भगाने लगा । वह तैरता हुआ आगे भी बढ़ता गया । उसे एक-दो जगह घाव भी लगे । आखिर वह नदी के दूसरे किनारे पर पहुँच ही गया । 

नदी के दूसरे किनारे पर उसे एक बड़ा-सा महल नजर आया । वह महल की ओर बढ़ा । महल के दरवाजे पर उसे एक तख्ती नजर आई । उस पर लिखा था - 'इस महल की हर चीज का मालिक में हैं। करी अनुमति के बिना कोई भी इस महल की किसी भी चीज को छूने या उठाने का प्रयत्न न करे ।' 

उन शब्दों को पढ़ता, वह महल के भीतर गया, तो उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं । महल में चारों ओर हीरे-मोती और सोना-चाँदी के ढेर लगे थे । उनकी रक्षा करने वाला वहाँ कोई भी नहीं था। 

महल के बाहर एक नाव थी । कोई भी उन हीरे-मोतियों को ते चुराकर, उस नाव द्वारा आसानी से भाग सकता था । परन्तु समीर ने इस बारे में सोचा भी नहीं । वह आगे बढ़ा। 

रास्ते में उसे एक बुढ़िया मिली । वह बुढ़िया सख्त घायल थी । समीर से बोली-"बेटा, एक सांड ने मुझे बुरी तरह घायल कर दिया है । घावों में सख्त पीड़ा हो रही है । मेरी सहायता करो।" बुढ़िया का कष्ट ना देखकर समीर बहुत दुखी हुआ । वह भूल गया कि वह वहाँ किसलिए से आया है ? 

बुढ़िया को उठाकर वह उसकी कुटिया में गया, जो समीप ही थी। बुढ़िया को बिस्तर पर लिटाकर वह जंगल से जड़ी-बूटियां जमा करने लगा, जिससे बुढ़िया का इलाज कर सके । जड़ी-बूटियों से उसने मलहम बनाया और उसे बुढ़िया के घावों पर लगाया । उससे बुढ़िया को आराम म. मिला । वह बुढ़िया की सेवा में लगा रहा । जब बुढ़िया अच्छी हो गई, तो ला उससे विदा लेकर आगे चल दिया । रास्ता समाप्त होने पर सामने ही गुफा थी । उसी गुफा में वह अनमोल खजाना था । वहाँ समीर को वे तीन दरवाजे कहीं नजर नहीं आए, जिनसे गुजरकर खजाने तक पर पहुंचना था । वह गुफा में पहुँचा, तो उसे गुफा में कोई खजाना तो नहीं मिला । केवल एक पुस्तक मिली, जिस पर लिखा था-"मैं ही अनमोल खजाना हूँ।" 

समीर उस पुस्तक को लेकर लौट चला । महल तक पहले खबर पहुँच चुकी थी कि एक नवयुवक राजा का इच्छित अनमोल खजाना लाने में सफल हो गया है। 

महल में उसके स्वागत की तैयारियाँ होने लगीं । समीर महल में पहुँचा, तो राजा यशोधन और राजकुमारी सुचिता ने उसका स्वागत किया । वहाँ गुरुदेव भी उपस्थित थे । समीर ने वह पुस्तक राजा को दी और आपबीती बता दी। 

“यही अनमोल खजाना है यशोधन !"- समीर की बात सुनकर गुरुदेव मुसकराकर बोले-“यह नवयुवक सुचिता से विवाह करने के योग्य है ।" 

"परंतु गुरुदेव !" -राजा आश्चर्य से बोले-"यह नवयुवक तो उन तीन दरवाजों से गुजरा ही नहीं, जिनकी चर्चा आपने की थी। भला, यह पुस्तक अनमोल खजाना कैसे हो सकती है ?" 

यह पुस्तक ही अनमोल खजाना है । इसका नाम है जीवन !" -

गुरुदेव ने कहा - युवक तो तीन दरवाजों से गुजर चुका है ! यह पुस्तक ही अनमोल खजाना है । इसका नाम है जीवन !" 

"मैं समझा नहीं गुरुदेव ।" 

सब गुरुदेव का मुँह देख रहे थे । गुरुदेव कहने लगे -"भयानक जंगलों और घड़ियालों का मुकाबला करके यह युवक नदी के किनारे पहुँचा । ये काम उसने केवल अपनी वीरता के सहारे ही किए । फिर उसे एक महल मिला, जिसमें हीरे-जवाहरात और सोने-चांदी के ढेर लगे थे। यदि यह चाहता, तो वहाँ से ढेर सारे हीरे-मोती लाकर अपना जीवन संवार सकता था । परन्तु इसने उन्हें छुआ भी नहीं, क्योंकि वे किसी दूसरे के थे । 

यह इसकी ईमानदारी थी । आगे इसने एक बुढ़िया की सेवा की । यदि इसके स्थान पर कोई दूसरा होता, तो बुढ़िया के पीछे अपना समय नहीं गंवाता । यह इसके दयालु होने का उदाहरण है । जिस व्यक्ति में ये तीन गुण हों, वह दुनिया में क्या नहीं कर सकता ! इसलिए यही सुचिता का पति बनने के योग्य है ?" 

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